आज की परिस्थिति में हम भारतीयों को कुछ पहलूओ पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। जिन्हें इस प्राचीन राष्ट्र के मौलिक चरित्र और आत्मा को बदलने के लिए एक बड़े डिजाइन के एक छोटे से हिस्से के रूप में आसानी से देखा जा सकता है। इस डिजाइन का मुकाबला करने और राष्ट्रीय हितों और भारत की भौगोलिक अखंडता की रक्षा करने की कार्रवाई के साथ जागरूकता ही एकमात्र समाधान है। इस पुस्तक का उद्देश्य लोगों को एक ऐसे मुद्दे पर जगाना है, जिसे आम आदमी ने गंभीरता से नहीं लिया है। यह मुद्दा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत के बुनियादी सामाजिक ताने-बाने और राष्ट्रीय चरित्र को बदल देगा।
इस मुद्दे में उन लोगों के लिए आरक्षण की मांग शामिल है, जो इस्लाम या ईसाई धर्म में धर्मांतरित हो गए थे। हालांकि यह मांग कोई नई नहीं है, लेकिन यह एक जनहित याचिका (पीआईएल) के कारण अचानक राष्ट्रीय कार्यसूची पर आ गई है, जिस पर वर्तमान में उच्चतम न्यायालय सुनवाई कर रहा है। जनहित याचिका केंद्र और ईसाई समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले दो संगठनों द्वारा दायर की गई है। जनहित याचिका में उन अनुसूचित जाति के लोगों के लिए आरक्षण की मांग की गई है जो इस्लाम या ईसाई धर्म में धर्मांतरित हो गए हैं। केंद्र सरकार ने हलफनामे के जरिए जनहित याचिका में मांग का औपचारिक रूप से विरोध किया है। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे का अध्ययन करने के लिए भारत के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय समिति का भी गठन किया है।
इस मामले का फैसला तो न्यायपालिका करेगी। लेकिन, हर भारतीय को इन पहलूओ को गंभीरता से लेना चाहिए जिससे भविष्य के खतरों को गंभीरता से समझा जा सकता है।
यह जनहित याचिका तब दायर की जा रही है जब अल्पसंख्यकों के मूल विचार को लोगों द्वारा चुनौती दी जा रही है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल है 'अल्पसंख्यक' शब्द की क्या आवश्यकता है जब संविधान धार्मिक भेदभाव को मंजूरी नहीं देता है और कानून के समक्ष सभी को समान मानता है? यह बिल्कुल अनुचित, अतार्किक और अन्यायपूर्ण है कि नागरिकों को एक ओर अल्पसंख्यक होने का लाभ मिलेगा और दूसरी ओर उनकी जाति के कारण भी फ़ायदा मिलेगा। भले ही उनका धर्म जाति को मान्यता न देता हो, परंतु यह हो रहा है। यह पुस्तक इस मुद्दे पर लोगों को जागरुक करने का एक प्रयास है। धर्मांतरित अनुसूचित जाति के लोगों के लिए आरक्षण की मांग हिमशैल का एक सिरा मात्र है। इन इरादों का अंदाजा कई अन्य कार्यों से लगाया जा सकता है। हम आग्रह करते हैं कि लोग इस पुस्तक के माध्यम से इस मुद्दे को समझें और इसे जन-जन तक ले जाएं। कहा जाता है कि शाश्वत सतर्कता लोकतंत्र की कीमत है। आइए हम सतर्क रहें।
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